न्यायिक पुनरवलोकन और न्यायिक सक्रियता

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Last Updated: 9/11/2025

न्यायिक पुनरवलोकन और न्यायिक सक्रियता (Judicial Review & Judicial Activism) | Indian Polity Notes in Hindi

न्यायिक पुनरवलोकन और न्यायिक सक्रियता (Judicial Review & Judicial Activism)

भारतीय संविधान में न्यायपालिका को यह अधिकार दिया गया है कि वह यह सुनिश्चित करे कि विधायिका और कार्यपालिका के सभी कार्य संविधान की सीमाओं के भीतर हों। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए दो प्रमुख सिद्धांत विकसित हुए हैं — न्यायिक पुनरवलोकन (Judicial Review) और न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)। ये दोनों भारतीय लोकतंत्र में **संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक अधिकारों की रक्षा** के स्तंभ हैं।


न्यायिक पुनरवलोकन (Judicial Review)

न्यायिक पुनरवलोकन का अर्थ है — न्यायालय द्वारा यह जांच करना कि संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई कानून या कार्यपालिका द्वारा किया गया कोई आदेश संविधान के अनुरूप है या नहीं। यदि वह असंवैधानिक पाया जाता है तो न्यायालय उसे अमान्य (Void) घोषित कर सकता है।

परिभाषा:

"Judicial Review means the power of judiciary to examine the constitutionality of legislative enactments and executive orders." — Justice Marshall (Marbury v. Madison, 1803)


संवैधानिक आधार (Constitutional Basis)

न्यायिक पुनरवलोकन का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं है, परंतु यह अधिकार निम्नलिखित अनुच्छेदों से प्राप्त होता है:

  • अनुच्छेद 13: कोई भी कानून जो मौलिक अधिकारों के विरुद्ध है, शून्य होगा।
  • अनुच्छेद 32: नागरिकों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सर्वोच्च न्यायालय जाने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय को रिट जारी करने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 131, 136, 143, 147: न्यायालय की व्याख्यात्मक और परामर्श शक्तियाँ।

न्यायिक पुनरवलोकन का महत्व

  • संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना।
  • मौलिक अधिकारों की रक्षा।
  • विधायिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण।
  • शासन प्रणाली में संतुलन बनाए रखना।
  • संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) की सुरक्षा।

न्यायिक पुनरवलोकन के प्रकार

  • 1️⃣ विधायी पुनरवलोकन (Legislative Review): संसद या विधानमंडल द्वारा बनाए गए कानूनों की समीक्षा।
  • 2️⃣ कार्यपालिका पुनरवलोकन (Executive Review): सरकारी आदेशों और कार्यों की संवैधानिकता की समीक्षा।
  • 3️⃣ न्यायिक पुनरवलोकन (Judicial Review of Judgments): न्यायालय के अपने निर्णयों की पुनः समीक्षा।

न्यायिक पुनरवलोकन के प्रमुख केस (Landmark Cases)

  • 1. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973): न्यायालय ने कहा कि संसद संविधान के मूल ढाँचे को नहीं बदल सकती।
  • 2. इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण (1975): न्यायालय ने चुनाव से संबंधित 39वें संशोधन को रद्द किया।
  • 3. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980): न्यायालय ने न्यायिक पुनरवलोकन को संविधान का अभिन्न अंग बताया।
  • 4. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967): संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।

न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism)

न्यायिक सक्रियता का अर्थ है — न्यायालय द्वारा संविधान और कानून की ऐसी व्याख्या करना जिससे सामाजिक न्याय, मानवाधिकार और सार्वजनिक हित की रक्षा हो सके, भले ही कोई व्यक्ति सीधे अदालत न जाए।

न्यायिक सक्रियता की शुरुआत:

  • भारत में न्यायिक सक्रियता की शुरुआत 1980 के दशक में हुई।
  • न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर इसके प्रमुख प्रवर्तक थे।
  • Public Interest Litigation (PIL) के माध्यम से इसका विस्तार हुआ।

न्यायिक सक्रियता के उदाहरण

  • हुसैनारा खातून केस (1979): — बंदियों के अधिकारों की रक्षा।
  • एम.सी. मेहता केस (1986): — पर्यावरण संरक्षण।
  • विशाखा केस (1997): — महिलाओं के कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा।
  • विष्णु लोचन मदन केस (2014): — आधार और निजता का अधिकार।

न्यायिक सक्रियता और PIL का संबंध

Public Interest Litigation (जनहित याचिका) न्यायिक सक्रियता का सबसे बड़ा माध्यम है। इससे आम नागरिक या संस्था भी किसी सामाजिक या पर्यावरणीय अन्याय के खिलाफ अदालत जा सकती है।


न्यायिक पुनरवलोकन और न्यायिक सक्रियता में अंतर

आधारन्यायिक पुनरवलोकनन्यायिक सक्रियता
स्वरूपसंवैधानिक अधिकारन्यायालय की पहल और व्याख्या
उद्देश्यसंविधान की रक्षाजनहित और सामाजिक न्याय
आधार अनुच्छेद13, 32, 226PIL और न्यायिक व्याख्या
उदाहरणकेशवानंद भारती केसविशाखा केस
सीमासंविधान के भीतरसंविधान की भावना के अनुसार

न्यायिक सक्रियता की सीमाएँ

  • अत्यधिक हस्तक्षेप से विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका प्रभावित होती है।
  • लोकतंत्र के सिद्धांतों पर खतरा।
  • “न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)” की संभावना।

प्रमुख केस — न्यायिक अतिक्रमण

  • प्रकाश सिंह केस (2006): — पुलिस सुधार पर अदालत के निर्देश।
  • सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स केस (2016): — NJAC को असंवैधानिक घोषित किया गया।

निष्कर्ष

न्यायिक पुनरवलोकन और न्यायिक सक्रियता दोनों ही भारतीय संविधान की आत्मा हैं। पहला संविधान की **सुरक्षा** सुनिश्चित करता है, जबकि दूसरा समाज में **न्याय और समानता** को सशक्त बनाता है। दोनों मिलकर भारतीय लोकतंत्र को संतुलित, संवैधानिक और उत्तरदायी बनाते हैं।


40 महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर (Questions & Answers)

Q1: न्यायिक पुनरवलोकन का अर्थ क्या है?
न्यायालय द्वारा कानूनों की संवैधानिकता की समीक्षा।

Q2: न्यायिक सक्रियता का अर्थ क्या है?
न्यायालय द्वारा सामाजिक न्याय हेतु सक्रिय भूमिका निभाना।

Q3: न्यायिक पुनरवलोकन की अवधारणा कहाँ से आई?
अमेरिकी केस Marbury v. Madison (1803) से।

Q4: भारत में न्यायिक पुनरवलोकन का संवैधानिक आधार क्या है?
अनुच्छेद 13, 32, 226।

Q5: न्यायिक पुनरवलोकन की रक्षा किस केस में की गई?
केशवानंद भारती केस (1973)।

Q6: न्यायिक पुनरवलोकन संविधान के किस तत्व की रक्षा करता है?
संविधान के मूल ढाँचे की।

Q7: न्यायिक सक्रियता का आरंभ किस दशक में हुआ?
1980 के दशक में।

Q8: PIL का पूरा रूप क्या है?
Public Interest Litigation।

Q9: PIL का उद्देश्य क्या है?
जनहित में न्यायिक हस्तक्षेप।

Q10: न्यायिक सक्रियता के प्रवर्तक कौन थे?
न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और वी.आर. कृष्ण अय्यर।

Q11: केशवानंद भारती केस किस वर्ष हुआ?
1973 में।

Q12: गोलकनाथ केस किससे संबंधित था?
संविधान संशोधन और मौलिक अधिकार।

Q13: इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण केस में क्या निर्णय हुआ?
39वां संशोधन रद्द।

Q14: न्यायिक पुनरवलोकन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
संविधान की सर्वोच्चता बनाए रखना।

Q15: न्यायिक सक्रियता की सीमा क्या है?
अत्यधिक हस्तक्षेप से अन्य संस्थाओं की स्वतंत्रता प्रभावित।

Q16: न्यायिक अतिक्रमण क्या है?
न्यायपालिका द्वारा अन्य अंगों की सीमा में दखल देना।

Q17: न्यायिक पुनरवलोकन किस सिद्धांत से जुड़ा है?
संविधान सर्वोच्च है।

Q18: न्यायिक सक्रियता का परिणाम क्या है?
जनहित और मानवाधिकारों की रक्षा।

Q19: न्यायिक पुनरवलोकन का प्रयोग कौन करता है?
सर्वोच्च और उच्च न्यायालय।

Q20: न्यायिक सक्रियता का दुष्प्रभाव क्या है?
लोकतांत्रिक संतुलन का ह्रास।

Q21: कौन-सा अनुच्छेद मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए रिट की अनुमति देता है?
अनुच्छेद 32।

Q22: कौन-सा अनुच्छेद उच्च न्यायालय को रिट जारी करने का अधिकार देता है?
अनुच्छेद 226।

Q23: कौन-सा केस ‘Basic Structure Doctrine’ से जुड़ा है?
केशवानंद भारती केस।

Q24: मिनर्वा मिल्स केस किस वर्ष हुआ?
1980 में।

Q25: न्यायिक सक्रियता में कौन-सा सिद्धांत लागू होता है?
न्यायिक व्याख्या का विस्तार।

Q26: कौन-सा केस पर्यावरण न्याय से जुड़ा है?
एम.सी. मेहता केस (1986)।

Q27: विशाखा केस (1997) किस विषय पर था?
महिलाओं के कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न।

Q28: PIL की शुरुआत कब हुई?
1979 में हुसैनारा खातून केस से।

Q29: न्यायिक पुनरवलोकन संविधान के किस सिद्धांत को दर्शाता है?
संविधान सर्वोच्च है, संसद नहीं।

Q30: कौन न्यायिक पुनरवलोकन का प्रयोग कर सकता है?
न्यायपालिका।

Q31: न्यायिक पुनरवलोकन का सबसे प्रमुख केस कौन-सा है?
केशवानंद भारती केस।

Q32: कौन-सा अनुच्छेद संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करता है?
अनुच्छेद 13।

Q33: न्यायिक सक्रियता का प्रमुख लाभ क्या है?
सामाजिक न्याय और पारदर्शिता।

Q34: न्यायिक अतिक्रमण (Overreach) का उदाहरण?
सुप्रीम कोर्ट का प्रशासनिक निर्णयों में अत्यधिक हस्तक्षेप।

Q35: कौन PIL दायर कर सकता है?
कोई भी नागरिक या संस्था।

Q36: न्यायिक पुनरवलोकन का अधिकार कहाँ से लिया गया है?
अमेरिकी संविधान से।

Q37: कौन-सा अनुच्छेद पुनर्विचार याचिका से संबंधित है?
अनुच्छेद 137।

Q38: न्यायिक सक्रियता से किसको सबसे अधिक लाभ होता है?
सामान्य जनता और वंचित वर्ग।

Q39: न्यायिक पुनरवलोकन का परिणाम क्या है?
संवैधानिकता की रक्षा और असंवैधानिक कानूनों की समाप्ति।

Q40: न्यायिक पुनरवलोकन और सक्रियता में मूल अंतर क्या है?
पहला संविधान की सुरक्षा है, दूसरा समाज की सुरक्षा।

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